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राधा नहीं, सुदामा के साथ विराजे हैं श्रीकृष्ण:उज्जैन के पास नारायणा धाम में आज भी मौजूद हैं दोनों की लकड़ियों की गठरियां

AdminSeptember 4, 2026
राधा नहीं, सुदामा के साथ विराजे हैं श्रीकृष्ण:उज्जैन के पास नारायणा धाम में आज भी मौजूद हैं दोनों की लकड़ियों की गठरियां
आमतौर पर भगवान श्रीकृष्ण की पूजा राधा के साथ होती है, लेकिन उज्जैन से करीब 32 किमी दूर स्थित नारायणा धाम मंदिर की पहचान ही अलग है। यहां भगवान श्रीकृष्ण के साथ उनकी बाल सखा सुदामा की पूजा होती है। मान्यता है कि इसी स्थान पर कृष्ण और सुदामा ने साथ में वन से लकड़ियां इकट्ठी की थीं। आज भी मंदिर परिसर में दोनों की लकड़ियों की गठरियों से जुड़े दिव्य वृक्ष मौजूद हैं, जिन्हें भक्त आस्था के साथ नमन करते हैं। मान्यता है कि नारायणा धाम वही स्थान है, जहां से कृष्ण-सुदामा की मित्रता का एक महत्वपूर्ण प्रसंग जुड़ा है। भागवत परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, कंस वध के बाद श्रीकृष्ण, बलराम और सुदामा उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में गुरु सांदीपनि से शिक्षा ले रहे थे। इसी दौरान गुरुमाता शुश्रूषा ने दोनों को वन से लकड़ियां लाने के लिए भेजा। गुरुमाता ने दिए थे दो मुट्ठी चने कथा के अनुसार, कृष्ण और सुदामा लकड़ियां लेने जंगल की ओर निकले। गुरुमाता ने रास्ते में खाने के लिए दोनों को दो मुट्ठी चने भी दिए थे। लकड़ियां इकट्ठी करते-करते शाम हो गई। इसी दौरान अचानक तेज बारिश शुरू हो गई। बारिश से बचने के लिए दोनों ने लकड़ियों के गट्ठर एक पेड़ के नीचे रख दिए। कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण पेड़ पर चढ़ गए और सुदामा नीचे रह गए। रात में भूख लगने पर सुदामा ने कृष्ण के हिस्से के चने भी खा लिए। श्रीकृष्ण ने आवाज सुनकर पूछा तो सुदामा ने चने खाने की बात छिपा दी। अगले दिन सुबह गुरु सांदीपनि दोनों को खोजते हुए जंगल पहुंचे और उन्हें वापस आश्रम ले आए। मान्यता है कि बारिश के कारण लकड़ियों के दोनों गट्ठर वहीं रह गए और समय के साथ उनसे पेड़ विकसित हो गए। आज भी हरे-भरे हैं दोनों ‘गट्ठर’ नारायणा धाम मंदिर में आज भी श्रीकृष्ण और सुदामा की लकड़ियों की गठरी से जुड़े दो वृक्ष मंदिर के दोनों ओर दिखाई देते हैं। श्रद्धालु इन्हें भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता से जुड़ी निशानी मानते हैं और इनका पूजन करते हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन वृक्षों पर आज भी हरे पत्ते आते हैं। इसी कारण यहां आने वाले भक्तों के लिए यह स्थान विशेष आस्था का केंद्र है। सुदामा के चने और दरिद्रता की मान्यता कृष्ण-सुदामा की कथा से जुड़ी एक अन्य मान्यता यह भी है कि सुदामा ने श्रीकृष्ण के हिस्से के चने खाए थे, जिसके कारण उन्हें जीवन में दरिद्रता का सामना करना पड़ा। वर्षों बाद जब सुदामा द्वारका पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया। सुदामा द्वारा लाए गए चावल स्वीकार करने के बाद श्रीकृष्ण ने उनकी दरिद्रता दूर कर दी। इसी कृष्ण-सुदामा की मित्रता और प्रेम को नारायणा धाम में आज भी श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। मंदिर से 300 मीटर दूर है स्वर्ण पर्वत नारायणा धाम मंदिर से करीब 300 मीटर दूर स्वर्ण पर्वत भी है। स्थानीय पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण के चरण पड़ने से यहां की भूमि और पर्वत सोने की तरह चमक उठे थे। इसलिए इसे स्वर्णगिरी पर्वत भी कहा जाता है। मान्यता है कि साल में एक बार पर्वत पर सोने जैसी चमक दिखाई देती है। यहां के पत्थरों को थपथपाने पर विशेष तरह की ध्वनि सुनाई देने की बात भी स्थानीय लोग बताते हैं। अहिल्या माता ने कराया था मंदिर का पुनर्निर्माण स्थानीय लोगों के अनुसार, नारायणा धाम मंदिर का पुनर्निर्माण देवी अहिल्याबाई होलकर के समय कराया गया था। मंदिर परिसर में एक कुंड भी है, जिसके बारे में मान्यता है कि वह कभी नहीं सूखता। मंदिर में हरियाली अमावस्या पर विशेष पूजन और यात्रा की परंपरा है। पूर्णिमा पर ध्वजारोहण किया जाता है। हरियाली अमावस्या पर फूलों की होली भी खेली जाती है। जन्माष्टमी पर विशेष आयोजन श्रीकृष्ण-सुदामा उत्सव समिति की ओर से हर साल जन्माष्टमी पर यहां विशेष आयोजन किए जाते हैं। समिति से जुड़े केसर सिंह पटेल के अनुसार, इस बार भी मंदिर में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। 25 से ज्यादा ग्रामीण संभालते हैं आयोजन की व्यवस्था श्रीकृष्ण-सुदामा उत्सव समिति से जुड़े करीब 25 ग्रामीण मंदिर के आयोजनों में सहयोग करते हैं। इनमें हीरालाल आंजना, केसर सिंह पटेल, अंतर सिंह, गोपीलाल उप सरपंच, डॉ. मोहन शर्मा, भगवान सिंह गोयल सरपंच, माधव सिंह, जगदीश पंडित, पंडित दौलतराम, पंडित प्रेमनारायण, आसाराम, देवीसिंह, जगदीश दायमा, ईश्वर शर्मा, सेवाराम, संजय आंजना और हाकम सिंह सहित अन्य ग्रामीण शामिल हैं। जन्माष्टमी पर नारायणा धाम में कृष्ण के बाल सखा सुदामा के साथ उनकी मित्रता की कथा, मंदिर की प्राचीन परंपराएं और लकड़ियों की गठरियों से जुड़े वृक्ष श्रद्धालुओं के आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहेंगे। नारायणा गांव को माना जाता था काल गणना का केंद्र उज्जैन से करीब 30 किमी दूर महिदपुर तहसील के नारायणा गांव स्थित नारायणा धाम को कभी कालगणना का प्रमुख केंद्र माना जाता था। मान्यता है कि पूर्व में कर्क रेखा नारायणा गांव से होकर गुजरती थी। पुराविद् डॉ. रमण सोलंकी के अनुसार श्रीकृष्ण के लकड़ी चुनने की घटना के समय बारिश हुई थी, जिसे उस समय सूर्य के कर्क राशि में होने का संकेत माना जाता है। मान्यता है कि श्रीकृष्ण-सुदामा ने यहां लकड़ी से शंकु यंत्र बनाया था और इसके जरिए खगोलीय गणना की जाती थी। श्रीकृष्ण के उज्जैन आने का समय करीब 5200 वर्ष पूर्व माना जाता है। नारायणा धाम से करीब 18 किमी दूर डोंगला से वर्तमान में कर्क रेखा गुजरती है। वर्ष 1985 में डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर ने इस स्थान की पहचान की थी। परीक्षणों और अध्ययन के बाद डोंगला में कर्क रेखा के नए स्थान की पुष्टि हुई और यहां आधुनिक वेधशाला के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई। आज डोंगला की वेधशाला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खगोलीय अध्ययन का महत्वपूर्ण केंद्र है। ये खबर भी पढ़ें… ग्वालियर में 120 करोड़ के गहने पहनेंगे राधा-कृष्ण ग्वालियर के रियासतकालीन गोपाल मंदिर में इस बार जन्माष्टमी का उत्सव राजसी वैभव के साथ मनाया जाएगा। 4 सितंबर को भगवान राधा-कृष्ण का श्रृंगार 120 करोड़ रुपए से अधिक कीमत के बेशकीमती आभूषणों से होगा। सोने, चांदी, हीरे, पन्ने, मोती और अन्य कीमती रत्नों से सजे इन आभूषणों को जन्माष्टमी के दिन सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के लॉकर से निकालकर मंदिर लाया जाएगा। सफाई करने के बाद ये भगवान को अर्पण किए जाएंगे।पूरी खबर पढ़ें

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