स्ट्रेस में इंस्टाग्राम खोला, फीड पर छा गईं सुसाइड पोस्ट:मेडिकल कॉलेज की स्टडी में बड़ा खुलासा, 63.5% पोस्ट ने किया खुदकुशी का महिमामंडन
AdminAugust 7, 2026
परीक्षा, रिलेशनशिप और भविष्य की चिंताओं से जूझ रहे 19 वर्षीय रिषी (बदला हुआ नाम) ने मन हल्का करने के लिए इंस्टाग्राम खोला। शुरुआत में सामान्य पोस्ट दिखीं, लेकिन उदासी और तनाव से जुड़ी कुछ रील्स देखने के बाद उसका फीड निराशा और आत्महत्या से जुड़े कंटेंट से भरने लगा। यह केवल एक उदाहरण है। भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज और हमीदिया अस्पताल के मनोरोग विभाग की 14 दिन की स्टडी में सामने आया है कि इंस्टाग्राम का ऐल्गोरिद्म मानसिक तनाव से जूझ रहे युवाओं को मददगार सामग्री की बजाय लगातार वैसा ही नकारात्मक कंटेंट दिखाने लगता है। रिसर्च में तीन अलग-अलग तरह के अकाउंट्स पर एक्सप्लोर और रील्स सेक्शन की 1,800 पोस्ट और सुझावों का विश्लेषण किया गया। स्टडी में आत्महत्या से जुड़े 148 कंटेंट मिले। इनमें 63.5% पोस्ट आत्महत्या को भावनात्मक या आकर्षक विकल्प की तरह पेश कर रही थीं। एक्सपर्ट्स का कहना है कि ऐसा पैटर्न तनाव, अकेलेपन या डिप्रेशन से जूझ रहे युवाओं के लिए जोखिम बढ़ा सकता है। पढ़िए, पूरी रिपोर्ट... 14 दिन की स्टडी में ऐसे परखा गया इंस्टाग्राम का एल्गोरिद्म हमीदिया अस्पताल के मनोरोग विभाग की सीनियर रेजिडेंट डॉ. सिमरन संधू ने बताया कि सोशल मीडिया आत्महत्या की रोकथाम और जोखिम, दोनों को प्रभावित कर सकता है। इसी प्रभाव को समझने के लिए इंस्टाग्राम के ऐल्गोरिद्म पर यह अध्ययन किया गया। शोध के दौरान तीन अलग-अलग इंस्टाग्राम अकाउंट बनाए गए। प्रत्येक अकाउंट ने 14 दिन तक केवल तय हैश टैग और कंटेंट के साथ इंटरैक्ट किया। इस अवधि में एक्सप्लोर और रील्स सेक्शन से मिले 1,800 पोस्ट और सुझावों का विश्लेषण किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि अलग-अलग तरह के कंटेंट देखने पर ऐल्गोरिद्म किस तरह की नई सिफारिशें (रिकमंडेशन) दिखाने लगता है। निगेटिव कंटेंट देखने पर बदल गया पूरा फीड स्टडी में तीन तरह के इंस्टाग्राम अकाउंट बनाए गए… डॉ. सिमरन संधू के अनुसार, जिन अकाउंट्स ने लगातार निगेटिव कंटेंट देखा, उनके एक्सप्लोर और रील्स फीड में समय के साथ आत्महत्या और निराशा से जुड़े सुझाव बढ़ने लगे। इसके विपरीत, सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य वाला कंटेंट देखने वाले अकाउंट्स को रिकवरी, मदद और मोटिवेशन से जुड़े पोस्ट अधिक दिखाई दिए जबकि न्यूट्रल समूह में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं मिला। GenZ सबसे ज्यादा जोखिम में गांधी मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रुचि सोनी के मुताबिक, इस तरह के कंटेंट का सबसे अधिक असर किशोरों और युवा वयस्कों (GenZ) पर देखा जा रहा है। उनके अनुसार, पढ़ाई, परीक्षा, करियर और रिश्तों का दबाव इस आयु वर्ग को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। इसके अलावा, बुजुर्ग भी जोखिम वाले समूह में हैं, जहां अकेलापन प्रमुख कारण बनकर सामने आता है। अकेलेपन और तनाव से जूझ रहे लोगों पर ज्यादा असर डॉ. रुचि सोनी के अनुसार, क्लीनिकल अनुभव में भी सोशल मीडिया का यह प्रभाव लगातार देखने को मिल रहा है। जो लोग पहले से अकेलेपन, तनाव या डिप्रेशन से जूझ रहे होते हैं, वे ऐसे कंटेंट से अधिक प्रभावित होते हैं। लंबे समय तक उदासी और निराशा से जुड़ी रील्स देखने से उनके मन में आत्महत्या जैसे विचार बढ़ सकते हैं। वहीं, रिकवरी और सकारात्मक मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा कंटेंट लोगों को उम्मीद देता है और मानसिक स्थिति बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है। डॉक्टर बोले- ऐल्गोरिद्म व्यवहार पढ़ता है, मानसिक स्थिति नहीं डॉ. सिमरन संधू ने बताया कि जब कोई व्यक्ति तनाव, अवसाद या भावनात्मक संकट से गुजर रहा होता है और बार-बार उसी तरह का कंटेंट देखता है, तो इंस्टाग्राम का ऐल्गोरिद्म उसकी मानसिक स्थिति नहीं, बल्कि ऑनलाइन व्यवहार के आधार पर वैसा ही कंटेंट और अधिक दिखाने लगता है। उन्होंने कहा कि आदर्श स्थिति में ऐसे यूजर को हेल्पलाइन, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों की जानकारी, मोटिवेशनल और रिकवरी आधारित कंटेंट दिखना चाहिए। हालांकि, इस स्टडी में इसका उल्टा पैटर्न देखने को मिला। विशेषज्ञों की सलाह- परिवार और दोस्तों से संवाद बनाए रखें मनोचिकित्सकों का कहना है कि यदि कोई व्यक्ति लगातार तनाव, उदासी या आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा है, तो उसे सोशल मीडिया पर समाधान तलाशने के बजाय परिवार, दोस्तों या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से खुलकर बात करनी चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, समय पर संवाद और पेशेवर मदद मानसिक संकट से बाहर निकलने का सबसे सुरक्षित और प्रभावी तरीका है।
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