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पेनकिलर के बाद दोनों किडनी खराब, 4 साल से डायलिसिस:आधा किमी चलना भी मुश्किल, समाजसेवियों की मदद से ठेला लगाकर परिवार संभाल रहे जितेंद्र

AdminAugust 9, 2026
पेनकिलर के बाद दोनों किडनी खराब, 4 साल से डायलिसिस:आधा किमी चलना भी मुश्किल, समाजसेवियों की मदद से ठेला लगाकर परिवार संभाल रहे जितेंद्र
इंदौर में रहने वाले 37 वर्षीय जितेंद्र कुमार की जिंदगी बीमारी ने पूरी तरह बदल दी। दोनों किडनी खराब होने के बाद पिछले चार साल से वे डायलिसिस पर हैं। सप्ताह में तीन दिन डायलिसिस के लिए अस्पताल जाना पड़ता है। आर्थिक परेशानियों और लगातार बिगड़ती सेहत के बावजूद जितेंद्र ने हिम्मत नहीं छोड़ी। अब वे अपनी क्षमता के अनुसार फल का ठेला लगाकर परिवार की जिम्मेदारी उठाने की कोशिश कर रहे हैं। इस काम के लिए उन्हें इंदौर के समाजसेवियों से मदद मिली है। जितेंद्र मूल रूप से अशोक नगर के रहने वाले हैं। साल 2017 में रोजगार की तलाश में इंदौर आए और यहां इलेक्ट्रिशियन का काम करने लगे। काम के दौरान होने वाली थकान और दर्द के कारण उन्होंने पेनकिलर लेना शुरू किया। जितेंद्र के मुताबिक, करीब एक महीने तक लगातार पेनकिलर लेने के बाद उनकी तबीयत बिगड़ने लगी। साल 2021 से स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बढ़ी और डॉक्टरों ने दोनों किडनी खराब होने की जानकारी दी। डायलिसिस का सामान भी खुद खरीदना पड़ा इसके बाद उन्होंने भोपाल और अहमदाबाद में भी इलाज कराया। फिलहाल सप्ताह में तीन बार डायलिसिस कराना पड़ता है। कई बार डायलिसिस में इस्तेमाल होने वाला डाइलाइजर, ट्यूबिंग और केमिकल उपलब्ध नहीं होने पर उन्हें ये सामान खुद खरीदना पड़ता है। बीमारी का असर इतना है कि वे करीब आधा किलोमीटर भी ठीक से नहीं चल पाते। नौकरी नहीं कर सके तो शुरू किया फल का ठेला जितेंद्र ने बताया कि बीमारी के कारण नौकरी करना मुश्किल हो गया। परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर वे कई बार रातभर सो नहीं पाते थे। उनके पिता मुन्नालाल विश्वकर्मा फर्नीचर का काम करते हैं और परिवार की जिम्मेदारी मुख्य रूप से उन्हीं पर है। छोटा भाई भी उनके साथ रहता है। परिवार पर आर्थिक बोझ कम करने के लिए जितेंद्र रोजगार की तलाश में कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचे। अधिकारियों ने उनकी बीमारी और बार-बार अस्पताल जाने की जरूरत को देखते हुए नौकरी के बजाय खुद का काम शुरू करने की सलाह दी। इसके बाद रेडक्रॉस के माध्यम से उन्हें 20 हजार रुपए की सहायता मिली, जिससे उन्होंने फल का ठेला खरीदा। हालांकि, इसके बाद उनकी तबीयत फिर बिगड़ गई और उन्हें करीब डेढ़ महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। समाजसेवियों ने की मदद अस्पताल से लौटने के बाद ठेले पर फल लगाने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। ऐसे में महाकाल संस्था के जय्यु जोशी और करीम खान ने 10 हजार रुपए की मदद की। इससे जितेंद्र ने ठेले पर फल रखना शुरू किया और दोबारा काम की शुरुआत की। जितेंद्र कहते हैं कि बीमारी ने शरीर को कमजोर जरूर किया है, लेकिन परिवार की जिम्मेदारी उठाने का हौसला अभी भी कायम है। उनका कहना है कि जितना संभव होगा, उतना काम करेंगे और परिवार के लिए अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश जारी रखेंगे।

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